
प्रति दह यातुधानान् प्रति दह किमीदिन:।
प्रतीची: कृष्णवर्तने सं दह यातुधान्य:॥ [अथर्ववेद १.२८.२]
इसका देवता चातन है। यह पद ‘चते याचने’ धातु, जो वेद में चातयतिर्नाशने (निरु.६.३) के अनुसार हिंसा अर्थ में भी प्रयुक्त होती है, से व्युत्पन्न होता है। इसका छन्द अनुष्टुप् होने से इसके दैवत व छान्दस प्रभाव से सृष्टि में तीव्र हिंसक क्रियाओं में वृद्धि होती है। विभिन्न छेदक-भेदन रश्मियाँ अनुकूलतापूर्वक कार्य करने में समर्थ होने लगती हैं। इसका भाष्य इस प्रकार है—
आधिदैविक भाष्य—
तीव्र भेदक त्रिष्टुप् एवं शक्वरी आदि छन्द रश्मियाँ (यातुधानान्) [यातुधाना हेति: (मै.२.८.१०), हेति: वज्रनाम (निघं.२.२०), हेतिर्हन्ते: (निरु.६.३)] विभिन्न वज्र रश्मियाँ के (प्रति, दह) प्रति दहनशील होने लगती हैं। (किमीदिन:, प्रति, दह) [किमीदिन: = किमीदिने। किमिदानीमिति चरते किमिदं किमिदमिति वा पिशुनाय चरते, पिशुन: पिंशते: विपिंशतीति (निरु.६.११)] उस समय उत्पन्न विभिन्न संयोज्य कणों को प्रकाशित करती तथा उनकी ऊष्मा को समृद्ध करती हैं। (प्रतीची:, यातुधान्य:, कृष्णवर्तने) [प्रतीची = अभिमुखी (निरु.३.५)] वे तीव्र भेदक रश्मियाँ अपने मार्ग में आने वाली वज्र रश्मियाँ को आकर्षण बल केे व्यवहारों में (सम्, दह) ऊष्मा प्रदान करती हैं।
भावार्थ— इस ब्रह्माण्ड में विद्यमान तीक्ष्ण रश्मियाँ असुर पदार्थ (डार्क एनर्जी) को नष्ट वा नियन्त्रित करने के लिए वज्र रश्मियों को तीव्र ऊष्मा से युक्त करती हैं। वे विभिन्न आयन्स वा एटम्स की ऊर्जा में वृद्धि करती तथा वज्र रश्मियों को अधिक ऊष्मा से समृद्ध करती हैं। वज्र रश्मियाँ उन रश्मियों को कहते हैं, जो हानिकारक पदार्थों को नष्ट करती तथा सूक्ष्म कणों को एकत्र करके उन्हें परस्पर संयुक्त करने में सहायक होती हैं। इन सब क्रियाओं से बाधक पदार्थ (डार्क मैटर) छिन्न-भिन्न होकर संयोग व वियोग की प्रक्रिया तथा ऊष्मा में वृद्धि होती है।
Summary: The Raśmi present in this universe energize the Vajra Raśmis with intense heat in order to destroy or control the Asura Padārtha (Dark Energy). They increase the energy of various ions or atoms and enrich the Vajra Raśmis with greater heat. Vajra Raśmis are those Raśmis that destroy harmful substances and help gather subtle particles and combine them with one another. Through all these actions, the obstructing substance is shattered, leading to processes of combination and separa-tion, along with an increase in heat.
आधिभौतिक भाष्य—
दुष्ट अपराधियों को दण्डित करने वाला राजा (यातुधानान्, प्रति, दह) राक्षसी स्वभाव वाले अपराधियों के प्रति अति कठोर व्यवहार वाला होवे, जिससे उन अपराधियों की अपराधवृत्ति नष्ट हो जाए अथवा उन अपराधियों को ही मृत्यु दण्ड देवे। (किमीदिन:, प्रति, दह) ‘अब क्या है’, ‘यह क्या है’ आदि सदैव नकारात्मक प्रश्न करने परन्तु पुरुषार्थ कुछ न करने वाले प्रमादी वा चुगली करने वालों को भी राजा दण्डित करे। (यातुधान्य:, प्रतीची:, कृष्णवर्तने) [प्रतीची: = प्रतिकूलं वर्तमाना: (म.द.ऋ.भा.३.१८.१)] पापान्धकार में लोकहित केे प्रतिकूल वर्तमान राक्षसी प्रवृत्ति वाले दुष्टों (सम्, दह) केे प्रति दहनशील होवे अर्थात् उन दुष्टों को कठोर दण्ड देने वाला होवे।
भावार्थ— जो व्यक्ति दूसरों का धन हरण करते, उन्हें पीड़ा पहुँचाते वा उनकी हत्या करते हैं, राजा को चाहिए कि ऐसे दुष्टों को कठोर दण्ड और आवश्यक होने पर मृत्यु दण्ड देवे। जो व्यक्ति आलसी व प्रमादी रहकर सदा सन्देह में डूबे रहते तथा दूसरों को भी भ्रमित करते हैं तथा जो पापपंक में डूबे एक-दूसरे की चुगली करते व राष्ट्र केे नागरिकों को भ्रमित करके अराजकता उत्पन्न करते हैं, उन सबको कठोर दण्ड देना चाहिए। जिस राष्ट्र में अपराधियों को कठोर दण्ड नहीं दिया जाता, उस राष्ट्र की प्रजा दारुण दु:ख उठाती है और दण्ड न देने वाले राजा व अपराधी दोनों पाप के भागी होते हैं। इसलिए अपराधियों को अपराध के अनुसार दण्ड देना अनिवार्य है। ध्यान रहे कि आलसी नागरिक भी राष्ट्र के लिए भार रूप ही होते हैं।
Summary: A person who seizes the wealth of others, causes them suffering, or kills them should be given strict punishment by the king, and if necessary, the death penalty. Those who remain lazy and negligent, always drowning in doubt, who confuse others, who indulge in sinful conduct, who gossip about one another, and who mislead the citizens to create disorder, should also receive strict punishment. A nation where criminals are not punished severely brings great suffering to its people, and both the king who fails to punish and the criminal become sharers of sin. Therefore, it is essential to punish offenders according to their crimes. Remember that lazy citizens are also a burden to the nation.
आध्यात्मिक भाष्य—
(यातुधानान्, प्रति, दह) योगसाधक को चाहिए कि वह अपने अन्दर आने वाले राक्षसी व हिंसक विचारों को साधना केे द्वारा जलाकर नष्ट कर दे। इसी प्रकार कुशल चिकित्सक को चाहिए रोगाणुनाशक औषधियों केे द्वारा शरीर केे साथ-साथ वायु व जल आदि में विद्यमान रोगाणुओं व विषाणुओं को पूर्णत: नष्ट कर दे। (किमीदिन:, प्रति, दह) जो कुविचार सात्त्विक विचारों वा मन की एकाग्रता को भंग करते हैं, साधक को चाहिए कि उन कुविचारों को अपने सतत अभ्यास एवं वैराग्य केे द्वारा दग्ध कर दे। इसी प्रकार चिकित्सक को चाहिए कि वह मन की चंचलता, भ्रम व अवसाद आदि को अपनी उत्तम औषधियों तथा पथ्यापथ्य के उचित निर्देशन के द्वारा दूर करने का यत्न करे अर्थात् उस मानसिक रोग को नष्ट कर दे। (यातुधान्य:, प्रतीची, कृष्णवर्तने) जो वृत्तियाँ योगपथ केे मार्ग केे प्रतिकूल वर्तमान होकर अज्ञान वा पापान्धकार की ओर ले जाने वाली होती हैं, उन अनिष्ट आसुरी वृत्तियों (सम्, दह) केे प्रति योगी को दहनशील होना चाहिए अर्थात् उन्हें अपने आत्मिक तेज से दग्ध कर दे। इसी प्रकार वैद्य को चाहिए कि रोगी केे शरीर में जो भी हानिकारक जीवाणु हों, उन्हें उचित आहार-विहार व औषधियों केे द्वारा नष्ट कर दे।
भावार्थ— प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि वह साधना के द्वारा अपने मन में उठने वाले कुविचारों को दूर करने का निरन्तर प्रयत्न करता रहे। इसी प्रकार योग्य वैद्य अपने रोगी तथा उसके निकटवर्ती वातावरण को भी जीवाणु मुक्त करने का प्रयत्न करे। मन में उठने वाले कुविचार अच्छे विचारों को मन में आने से रोकते हैं तथा मन की एकाग्रता को भंग करते हैं। इसे निरन्तर अभ्यास, वैराग्य तथा सात्त्विक भोजन आदि के द्वारा दूर किया जा सकता है। योगी इन सभी विचारों व कुसंस्कारों को अपने आत्मिक तेज के द्वारा नष्ट कर दे।
Summary: Every person should constantly strive through discipline to remove the negative thoughts that arise in the mind. In the same way, a competent physician should try to free the patient and the surrounding environment from harmful germs. The negative thoughts that arise in the mind prevent good thoughts from entering and disturb concentration. These can be removed through regular practice, detach-ment, and pure food. A Yogi destroys such thoughts and negative impressions with his inner spiritual strength.
नोट— इस भाष्य की तुलना अन्य विद्वानों द्वारा किए गए भाष्यों से करके अवश्य देखें।
सुन वेदों में बहती है, एक अमृत की धारा,
जिसने पिया ये अमृत, उसने जन्म सँवारा ।
वो ही तो है महाज्ञानी, सब उनकी मेहरबानी,
अब भी छोड़ो नादानी, सुन वेद की अमृत वाणी।।
ये जीवन तो एक दिन जाना है,
लौट के नहीं फिर आना है…
भाष्यकार— आचार्य अग्निव्रत
प्रमुख, वैदिक एवं आधुनिक भौतिकी शोध संस्थान
(श्री वैदिक स्वस्ति पन्था न्यास द्वारा संचालित)




