
कुछ धूर्त लोग ऋषि दयानन्द के वेदभाष्य को भाँग के नशे में लिखा गया कहते हैं। ऐसा वे ऋषि दयानन्द के वेद भाष्य के हिन्दी अनुवाद में रही कमियों के आधार पर कहते हैं, क्योंकि ऋषि का भाष्य संस्कृत में है और वह उनकी समझ में नहीं आता और यदि आ जाये, तो वे द्वेषवश उसे समझना नहीं चाहते।
मैं यह बात स्पष्ट कर दूँ कि हिन्दी अनुवाद ऋषि दयानन्द के लेखकों का है, न कि ऋषि दयानन्द का और उसमें अनेक त्रुटियाँ भी रह गई हैं। इस पर भाष्य के प्रकाशकों तथा सभाओं के विद्वानों को शीघ्रातिशीघ्र विचार करके योग्य विद्वानों से संस्कृत भाष्य के अनुकूल निर्दोष अनुवाद वा व्याख्या कराने का प्रयास करना चाहिए। जो उसमें दोष ढूँढ़ते हैं, उन्हें मैं कहना चाहूँगा कि क्या वे किसी वेदमन्त्र का भाष्य कर भी सकते हैं? यदि भाष्य में त्रुटि मानते हैं, तब क्या वे उन-उन मन्त्रों का निर्दोष भाष्य कर सकते हैं? जब तक वे ऐसा नहीं कर सकते, तब तक उन्हें आरोप लगाने का कोई अधिकार नहीं है।
उधर यह भी विचारें कि ऋषि दयानन्द लगभग २१ वर्ष की अवस्था में सच्चे शिव की खोज में घर से निकलते हैं। मार्ग में अनेक साधुओं के सम्पर्क में आते हैं। वे किसी योग्य को गुरु चुनने का लक्ष्य लेकर पहाड़ों, जंगलों, मन्दिरों व मठों में भटकते हैं। उन्हें भाँग-गाँजे वाले नकली साधु भी मिले। उन्हें उस समय असली व नकली साधु की पहचान नहीं थी। किसी नकली साधु ने भाँग खाना सिखा दिया और उन्होंने खा ली। जब तक वे गुरुवर दण्डी स्वामी विरजानन्द जी सरस्वती के सानिध्य में नहीं आये थे, तब तक उन्हें स्पष्ट मार्ग का बोध ही नहीं था। गुरुवर से विदा होने के पश्चात् और उनके सानिध्य से पूर्व के उनके व्यक्तित्व में बहुत अन्तर है। केवल समानता है, तो कठोर ब्रह्मचर्य, वज्रतुल्य शरीर, प्रबल वैराग्य व सत्य की प्रबल विज्ञासा की। उनका पूर्णत्व उनके सत्यार्थ प्रकाश और उससे भी अधिक उनकी ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका एवं वेदभाष्य (केवल संस्कृत भाग) में ही मिलता है और उसी काल में उनका व्यक्तित्व पूर्ण दिखाई देता है।
ऋषि दयानन्द ने अपने ग्रन्थों में मादक पदार्थों के सेवन का कितना विरोध किया है, यह इन द्वेषी लोगों को दिखाई नहीं देता। ऋषि दयानन्द ने अज्ञानता में भूल की उसे भी अपनी आत्मकथा में दर्शा दिया, यह उनके आत्मा की पवित्रता का प्रतीक है, परन्तु इनके मन्दिर तो आज भी भाँग-गाँजा, अफीम आदि के अड्डे बने हुए हैं। ये मादक पदार्थों को भगवान् शिव का प्रसाद कहकर आज भी ग्रहण कर रहे हैं। कामाख्या आदि मन्दिरों आज भी निरीह पशुओं का खून बहाया जाता है, वह इन धूर्तों का दिखाई नहीं देता। जबकि आर्य समाज के मन्दिरों में कहीं भी किसी भी प्रकार का कोई नशा नहीं होता और न ही किसी अभक्ष्य पदार्थों का सेवन होता है।
वास्तविकता यह है कि ऋषि दयानन्द पर अँगुली उठाने वाले लोग चरित्र, विद्या आदि किसी भी गुण की दृष्टि से उन पर टिप्पणी करने के अधिकारी नहीं हैं। यदि उनके पास प्रतिभा व ईमानदारी है, तो उन्हें ऋषिकृत ग्रन्थों व जीवनी को निष्पक्षभाव से पढ़ना चाहिए। अन्यथा सूर्य पर थूकने का परिणाम क्या होता है, वे स्वयं जानते हैं? दुर्बल चरित्र, ईर्ष्यालु, द्वेषी, छली-कपटी व अविद्याग्रस्त लोगों के द्वारा उस महान् आत्मा, ऋषि परम्परा के संवाहक को भंगेड़ी कहना पाप की पराकाष्ठा है।
—आचार्य अग्निव्रत
प्रमुख, वैदिक एवं आधुनिक भौतिकी शोध संस्थान
(श्री वैदिक स्वस्ति पन्था न्यास द्वारा संचालित)