
पुत्रमत्तु यातुधानी: स्वसारमुत नप्त्यम्।
अधा मिथो विकेश्यो विघ्नतां यातुधान्यो वितृह्यन्तामराय्य:॥ [अथर्ववेद १.२८.४]
इस मन्त्र का देवता चातन एवं छन्द पथ्यापंक्ति होने से इसके दैवत व छान्दस प्रभाव से विभिन्न भेदन-छेदन क्रियाएँ उचित रूप से विस्तृत तथा परिपक्व होने लगती हैं। इसका भाष्य इस प्रकार है—
आधिदैविक भाष्य—
(यातुधानी:) [यहाँ यातुधानी पद का अर्थ ऐसी वज्र रश्मियाँ है, जो गमन करते हुए कणों को रोक कर उन्हेें यजन क्रियाओं के लिए प्रेरित करती हैं। वे वज्र रश्मियाँ (पुत्रम्, अत्तु) [पुत्र: = पुत्रो वै वीर: (श.३.३.१.१२)] प्राणा वै दशवीरा: (श.१२.८.१.२२)] निकटवर्ती विभिन्न प्राण रश्मियों को अवशोषित करने लगती हैं। यहाँ लट् लकार को लोट् छान्दस प्रयोग है। इसके लिए इस छन्द रश्मि को उत्पन्न करने वाली ऋषि रश्मियाँ वज्र रश्मियों को प्राण रश्मियों को अवशोषित करने के लिए प्रेरित करती हैं। (उत, स्वसारम्) [स्वसा = सु असा स्वेषु सीदतीति वा (नि.११.३२) स्वसार: = अंगुलिनाम (निघं.२.५)] और वे वज्र रश्मियाँ स्वसा अर्थात् फोटोन्स वा कणों केे अन्दर अच्छी प्रकार विद्यमान रश्मियों तथा (नप्त्यम्) [नप्त्यम् = नप्ता = न पततीति (उ.को.२.८५)] उनसे उत्पन्न ऐसी सूक्ष्म रश्मियों, जो विभिन्न असुर रश्मियों के सूक्ष्म प्रहार से विचलित नहीं होतीं, को भी अवशोषित कर लेती हैं। (अधा, विकेेश्य:, मिथ:) यहाँ ‘अध:’ के स्थान पर ‘अधा’ पद का प्रयोग छान्दस है। इसकेे अनन्तर वे विभिन्न प्रकार की बिखरी हुई रश्मियों वाली वज्र रश्मियाँ परस्पर (विघ्नताम्) एक-दूसरे को विशेष रूप से नष्ट वा निष्क्रिय कर देती हैं। (यातुधान्य:) वे वज्र रश्मियाँ (अराय्य:) एक-दूसरे को किसी भी प्रकार की ऊर्जा प्रदान नहीं करती हैं, बल्कि सभी अपनी-अपनी ऊर्जा तथा निकटस्थ प्राणादि रश्मियों से ऊर्जा प्राप्त करके अपने कार्य सिद्ध करती हैं। (वितृह्यन्ताम्) वे वज्र रश्मियाँ अपना कार्य सिद्ध करने के उपरान्त स्वयं एक-दूसरे पर आघात करके नष्ट हो जाती हैं।
भावार्थ— विभिन्न वज्र रश्मियाँ जहाँ कणों के संयोग में बाधक पदार्थों को नष्ट करती हैं, वहीं संयोज्य कणों को आकर्षित करके उन्हें संयुक्त होने में सहयोग भी प्रदान करती हैं। वे वज्र रश्मियाँ आकाश में सर्वत्र भरे हुए वायु तत्त्व (वर्तमान भाषा में वैक्यूम एनर्जी) में विद्यमान कुछ प्राण रश्मियों को अवशोषित करके अपनी ऊर्जा को समृद्ध करती रहती हैं। ये वज्र रश्मियाँ विभिन्न कणों एवं फोटोन्स में विद्यमान ऊर्जा को भी अवशोषित कर लेती हैं, इससे उनकी ऊर्जा में और अधिक वृद्धि होने लगती है। इससे वे ऊर्जा से और भी अधिक समृद्ध हो जाती हैं। तब वे संयोज्य कणों के मध्य विद्यमान बाधक ऊर्जा (वर्तमान भाषा में इसे डार्क एनर्जी भी कह सकते हैं) को नष्ट करके उन संयोज्य कणों को परस्पर संयुक्त होने में सहयोग करती हैं। वे वज्र रश्मियाँ परस्पर एक-दूसरे को ऊर्जा का कोई आदान-प्रदान नहीं करतीं। संयोग क्रिया सम्पन्न होने अथवा बाधक पदार्थ के नष्ट होने के उपरान्त वे वज्र रश्मियाँ स्वयं अपना अस्तित्व खो देती हैं अर्थात् वे वायु तत्त्व में ही विलीन हो जाती हैं। इस प्रकार उनकी सम्पूर्ण ऊर्जा संयोग व भेदन कार्य में ही काम आ जाती है।
Summary: Where different Vajra Raśmis destroy the obstructing substances in the combination of particles, they also attract the combinable particles and assist them in uniting. Those Vajra Raśmis keep enriching their energy by absorbing some Prāṇa Raśmis present in the Vāyu Tattva, which is filled throughout the space. These Vajra Raśmis also absorb the energy present in different particles and photons, due to which their energy increases even more. This makes them even more enriched with energy. Then they neutralize the obstructing energy present between the combinable particles and help those particles unite with each other. Those Vajra Raśmis do not exchange any energy with one another. After the completion of the combination process or the destruction of the obstructing substance, those Vajra Raśmis lose their existence, meaning they dissolve into the Vāyu Tattva itself. In this way, their entire energy is used only in the process of combination and penetration.
आधिभौतिक भाष्य—
युद्ध के समय धर्मात्मा राजा अधर्मी शत्रु सेना पर ऐसे मोहिनी अर्थात् भ्रामक अस्त्र का प्रहार करे, जिससे (यातुधानी:) राक्षसी वृत्ति की वह शत्रु सेना (पुत्रम्, अत्तु) अपने ही वीरों को नष्ट करना प्रारम्भ कर दे। (स्वसारम्, उत, नप्त्यम्) और वह सेना अपनी अग्रणी पंक्ति, जो प्रत्येक आक्रमण केे समय अंगुलियों के समान सबसे अग्रणी होकर प्रथम प्रहार करती है, को भी नष्ट करना आरम्भ कर दे। इसके साथ ही वह अपने उन योद्धाओं, जो युद्ध में सदा अविचल डटे रहते हैं, को भी नष्ट कर दे। (अधा, विकेश्य:, मिथ:, यातुधान्य:, विघ्नताम्) [अधा = अध: = न धावतीत्यूर्ध्वगति: प्रतिषिद्धा (निरु.३.११) केशी = केशीदं ज्योतिरुच्यते (निरु.१२.२६)] वे आगे न बढ़ती हुई सेनाएँ उस मोहिनी अस्त्र, जो अन्धकार उत्पन्न करने के साथ-साथ शत्रु को भ्रमित भी करता है, केे मोहान्धकार से ग्रस्त होकर परस्पर एक-दूसरे का ही नाश करने लग जाएँ। (अराय्य:, वितृह्यन्ताम्) वे शत्रु सेनाएँ वा उनकी टुकड़ियाँ परस्पर एक-दूसरेे का सहयोग न करती हुई एक दूसरेे को ही पीड़ा देने लगें, ऐसा वार करना चाहिए।
भावार्थ— जब दुष्ट शत्रु सेना प्रबल हो और छल-कपट का युद्ध कर रही हो, तब बुद्धिमान् धार्मिक सेनापति को चाहिए कि वह उसके साथ माया युद्ध ही करे। वह ऐसे मोहक अस्त्रों, जो अन्धकार को प्रकट करने वाले हों, का प्रयोग करे कि शत्रु सेना केे वीर योद्धा भ्रमित होकर एक-दूसरे को ही नष्ट करने लग जाएँ। वे अपनी अग्रिम पंक्ति केे योद्धाओं और युद्ध में अविचल लड़ सकने में समर्थ योद्धाओं को ही शत्रु समझ कर उन्हेें ही नष्ट करने लगें। उस अस्त्र केे प्रभाव से शत्रु सेना की टुकड़ियाँ मोहान्ध होकर एक-दूसरे से ही लड़ने लग जाएँ और वह सेना एकजुट न रहकर परस्पर लड़कर नष्ट हो जाए। इसी प्रकार दुर्बल सेना भी सबल सेना को पराजित कर सकती है।
Summary: When the wicked enemy army is strong and fighting with deceit, then the wise and righteous commander should also wage a strategic war. He should use such illusionary weapons that reveal darkness, so that the brave warriors of the enemy army become confused and start destroying each other. They should mistake their own frontline fighters and warriors capable of fighting steadily in battle as the enemy and begin to destroy them. Under the effect of that weapon, the enemy divisions, blinded by delusion, start fighting among themselves, and that army, instead of staying united, destroys itself by mutual conflict. In this way, even a weak army can defeat a strong army.
आध्यात्मिक भाष्य—
(यातुधानी:) मनुष्य की दुष्ट वृत्तियाँ (पुत्रम्, अत्तु) उसके प्राण-बल को नष्ट कर देती हैं अर्थात् पाप वृत्तियाँ मनुष्य के बल को क्षीण कर देती हैं। (स्वसारम्, उत, नप्त्यम्) वे पापवृत्तियाँ उस व्यक्ति के ज्ञान-प्रकाश में रमण करने वा योग मार्ग में अविचल रहने वाले विचारों को भी खा जाती हैं अर्थात् ऐसे विचारशील साधकों के मन की एकाग्रता में बहुत बाधा उत्पन्न करती हैं। (अधा, विकेश्य:, मिथ:, विघ्नताम्) इसके अनन्तर विशेषरूप से प्रकाशित हितकारिणी वृत्तियाँ परस्पर एक-दूसरे को प्राप्त होती तथा असुरवृत्तियों को नष्ट कर देती हैं। (यातुधान्य:, अराय्य:, वितृह्यन्ताम्) इस प्रकार उन सद् वृत्तियों के कारण दुष्ट वृत्तियाँ मनुष्य को दु:ख न देते हुए स्वयं नष्ट हो जाती हैं।
भावार्थ— मनुष्य के मन में उठने वाले कुविचार मनुष्य के शारीरिक, मानसिक व आत्मिक बल तथा ज्ञान व मन की एकाग्रता को नष्ट कर देते हैं। उधर सद् वृत्तियाँ परस्पर एक-दूसरे को प्राप्त होती हुई असुर वृत्तियों को नष्ट कर देती हैं। इस प्रकार वे कुविचार सद् वृत्तियों के कारण मनुष्य को दु:ख न दे पातीं और स्वयं नष्ट हो जाती हैं।
Summary: The evil thoughts that arise in a person’s mind destroy a person’s physical, mental and spiritual strength, as well as knowledge and concentration of mind. On the other hand, good tendencies, by supporting one another, destroy the demonic tendencies. In this way, because of these good tendencies, the evil thoughts cannot cause suffering to a person and are themselves destroyed.
नोट— इस भाष्य की तुलना अन्य विद्वानों द्वारा किए गए भाष्यों से करके अवश्य देखें।
सुन वेदों में बहती है, एक अमृत की धारा,
जिसने पिया ये अमृत, उसने जन्म सँवारा।
वो ही तो है महाज्ञानी, सब उनकी मेहरबानी,
अब भी छोड़ो नादानी, सुन वेद की अमृत वाणी।।
ये जीवन तो एक दिन जाना है,
लौट के नहीं फिर आना है…
भाष्यकार— आचार्य अग्निव्रत
प्रमुख, वैदिक एवं आधुनिक भौतिकी शोध संस्थान
(श्री वैदिक स्वस्ति पन्था न्यास द्वारा संचालित)




